​दिलासा!!!

इंतेजार था मुझे, थी एक आशा बंधी,
जीता था हर दिन,
हर पल रहती थी ये चाहत,
मिलेगी वो राह चलते,
इस पग पर या उस पथ पर।
कैसे पहचानेगी उन आँखों को,
ये आँखें मेरी,
भय था कि पास आ कर भी,
हो न जाये फिर वो दूर कहीं,
करता था मैं दुआ हर वक़्त उस खुदा से,
रहना नहीं अकेले अब बस मेरे!
कह गया ग़ालिब गुजरते मेरे बगल से,
वक़्त सिर्फ लाता नहीं तोहफे बिना किसी खत के!!

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