अपनो का डर!!

डर था हममें अपने घर के बर्बाद होने का
डर था पड़ोसी के पत्थर से खिड़किया टूटने का,
डर था कहीं कोई बाहरी न आ जाये
बन के दीवार अपनो में,
सोचा की अपने छोटे मतभेद को सुलझा लेंगे बातों से,
सोचा था जो न कर सके पूर्वज मेरे,
प्यार से मना लेंगे सबको, अपना बना लेंगे सबको,

पर!
क्या हुआ, क्या बदला ?
नव पीढ़ी हिंसक हो चुकी,
हाथ हाथ में ले तलवार लाठी खुद की शीशे तोड़ रहे,
पड़ोसी , बाहरी क्या करेंगे तबाह हमे,
जब खुद से अपनो को जला रहे,
बनता घर अपना अच्छा इससे पहले उसे जला रहे।

राम के नाम पर अल्लाह, और अल्लाह के नाम पर राम
के बसाये संसार को उजाड़ रहे!
जीवन मूल्य खो रहा, इंसान दानव हो रहा,
सोचा शिक्षित हो नई पीढ़ी देश संवारेगी,
बुद्धिमता के बल पर सच झूठ को परखेगी,
लेकिन यहां धरती उल्टी हो रखी,
अक्षर काला हो गया, दो अजनबियों के बातों से,
भाई – भाई का गर्दन रेत रहा।

जो कल कर रहे थे शिक्षा के प्रकाश की बात,
पढ़ लिख कर आज वो, ले मशाल लगा रहे आग,
रो रहा मै, कि किसको क्या समझाऊं,
डिग्रियां शून्य हो गईं कइयों की,
सुन के पागल नेताओं की बात!
सवारने के बदले लगा रहे खुद के घर में आग।

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​दिलासा!!!

इंतेजार था मुझे, थी एक आशा बंधी,
जीता था हर दिन,
हर पल रहती थी ये चाहत,
मिलेगी वो राह चलते,
इस पग पर या उस पथ पर।
कैसे पहचानेगी उन आँखों को,
ये आँखें मेरी,
भय था कि पास आ कर भी,
हो न जाये फिर वो दूर कहीं,
करता था मैं दुआ हर वक़्त उस खुदा से,
रहना नहीं अकेले अब बस मेरे!
कह गया ग़ालिब गुजरते मेरे बगल से,
वक़्त सिर्फ लाता नहीं तोहफे बिना किसी खत के!!

टूट रहा भारत, बिखर रहा हिंदुस्तान मेरा!!!

टूट रहा भारत, बिखर रहा हिंदुस्तान,
जाति – धर्म के नाम पर विफल हो रहा इंसान,
है मची मार काट, हिंसक हो रहा अपना समाज,
दो जुबान के कहने पे है मचा दानव सा उत्पात!
नेता बन बैठा उपदेशक, विष प्रहार कर रहा,
भोला भला इंसान देश का,
फिर भी उन नेता का पद प्रक्षालन कर रहा,
रो रहा देश मेरा, बह रहा इसका लहू,
दो कर्कश बातों के कारण,
पुत्र, पुत्र को बीध रहा!

आरक्षण, धर्म जस नाम के मुखोटों से ढक,
कोई अपनापन जता रहा,
अपना अपना कह हम सबसे वो,
अपना स्वार्थ निभा रहा!
जागो इससे पहले टूट जाएँ हम इस कदर,
इस राजनीती के अग्नि से भाग भी ना पाएं चाह कर,
सरक्षण का वादा कर लूट रहे हमको जो,
शिक्षित हो, पहचानो उनको, और बचा लो खुद को!

टूट रहा भारत, बिखर रहा हिंदुस्तान,
जाति – धर्म के नाम पर विफल हो रहा इंसान,
है मची मार काट, हिंसक हो रहा अपना समाज,
दो जुबान के कहने पे है मचा दानव सा उत्पात!

अधूरा ख्वाब!!!

बैठा मैं यहाँ सोच रहा,
बस सोच रहा!
होती ना हिम्मत मुझे,
की कह दूँ तुझे ,
वह हर कुछ जो है,
दिल मे मेरे!!

है तू सामने,
लेकिन सिल सी गयी,
जैसे ज़ुबान मेरी,
अटक सी गयी बात हर वो,
जैसे है हलक मे मेरे!!

कह दूं इस बहाने,
या उस,
है समझ मे आए ना,
काश एक बार हिम्मत जुटा लू,
और कह सकूँ हर वो एहसास मेरे!!

पता नही कब,
मैं कर सकूँगा वो,
जो है चाहत मेरी सालों की,
या चला जाऊँगा दूर इतने,
की बनेगी ये हार,
जो है ख्वाब मेरी!!

मरहम के पैसे थे नहीं!!!

हुई खता थी मुझसे,
जख्म थे ख़रीदे मैंने,
इल्म था इसका मुझे नहीं,
महंगे पड़े सारे गम थे मेरे,
समझा देर से ही सही!!

छिपा खुद के साये में मैं,
ख्वाब बुन रहा था उस घड़ी,
एक एक कर बिखरते गए वो,
हर एक पल, हर एक घड़ी!!
दर्द तो थे ही, जख्म नासूर बन गयी,
थी हर पल महंगी इतनी,
मरहम के लिए पैसे बचे नहीं!!

पहले भी गिरा था,
चोट थी पहले भी लगी,
लेकिन हुआ था ऐसा नहीं,
इस बार खुद थे गम ख़रीदे,
जख्म भी ख़रीदा खुद ही,
नासूर बदतर हो रही,
मरहम के पैसे जो बचे नहीं!!

तेरे एहसास है पास मेरे!!

ऐसा पहली बार हुआ नहीं,
कुछ नया हुआ नहीं,
सोच हर बार की तरह,
है उसी मोड़ पर खड़ी,
तेरी मौजूदगी है नहीं,
फिर भी तेरे एहसास है पास मेरे!!

सपना है ये जनता हूँ,
सच सा लगता है मुझे,
सपनो की दुनिया में जी रहा,
खुद को पूरा सा महसुस कर रहा,
तुझको न पाकर मैं हार रहा,
लेकिन ज्यादा गम न है दिल में मेरे!!

थी मेरे दिल में तू,
जिस दिन से मैंने देखा तुझे,
कोशिश की भुला दूँ तुझे,
बस मेरा न चला उसपर,
रहेगी तू दिल में मेरे,
जब तक चलेंगे साँस मेरे!!

कुछ नया है नहीं,
है सब कुछ वैसा ही,
देखा जिस दिन से तुझे,
चाहत मेरी गयी नहीं,
तेरी मौजूदगी है नहीं,
फिर भी तेरे एहसास है पास मेरे!!

एक नया नाम तुझे चाहने वालों में।।।

क्या हुआ , कब हुआ, है नहीं पता मुझे,
फिर लग रहा मुझे कि खो गया मैं फिर से,
दूरियाँ बढ़ी तब चला पता मुझे,
कहीं न कहीं कुछ तो हुआ मुझे।

आज जाना मैं देख कर तेरी हँसी,
क्या था खोया हुआ इन कुछ दिनों से,
आजा वापस तू, है तेरी कमी यहाँ,
तुझे चाहने वालों के पन्नो में,
जुड़ गया है एक नाम फिर से।

आज फिर हार गया मैं!!!

आज फिर हार गया मैं,
आज फिर से दिल को चोट मेरे लगी,
आज छोड़ गयी वो मुझे,
जिसके संग बुन रहा था मैं सपने कई|

है ऐसा क्यों,
कि सोचता रह जाता हूँ मैं,
जीत लेता है और कोई,
क्यों है ऐसा कि पीछे रह जाता मैं,
भाग पीछे से आगे जाता है और कोई|

आज फिर हार गया मैं,
आज फिर से दिल को चोट मेरे लगी!!

चूक गया मैं!!!

 

भय था न होऊंगा सफल,
सो कोशिश कभी की नहीं,
आज जो होना था मेरे पास,
पाने से पहले खो दिया मैंने,
चूक गया मैं!

सोचता रहा तब तक,
जब तक न सोच लिया कि
है नहीं संभव मेरे लिए उसको पाना,
आज जब वो है किसी और कि,
तो फिर क्यों रोना सोच के कि,
चूक गया मैं!

आज भी तस्वीरों को देखता हूँ,
रोकता हूँ अपने आपको,
कि न आये वो मेरे सोच में,
लेकिन क्या करूँ आज भी वो बसी
है विचारों में जिसे हूँ,
चूक गया मैं!

भय था न होऊंगा सफल,
सो कोशिश कभी की नहीं,
आज जो होना था मेरे पास,
पाने से पहले खो दिया मैंने,
चूक गया मैं!

मैं गुस्ताख!!!

हूँ बदनाम मैं नज़रों में उनकी,
आवारा सी मेरी तस्वीर बनी,
गुस्ताखी क्या थी, कब की मैंने,
इल्म इसका था मुझे नहीं!
हूँ गुस्ताख सोच में मैं उनके,
न कुछ ऐसा किया मैंने कभी,
कि चोट उन्हें पहुंचे कहीं,
फिर भी पता नहीं,
कौन सी गलती, कब कर दी मैंने,
कि दर्द कोई बढ़ गयी उनकी,
बदतमीज़ का तगमा दिया,
पागल ठहरा दिया मुझे,
मैं तो बस दीवाना था उनका,
आवारा बना दिया उन्होंने,
गुस्ताखी शायद मैंने न की हो कोई,
मुजरिम बना, कठिन सजा दिया हर घड़ी|
हूँ बदनाम मैं नज़रों में उनकी,
आवारा सी मेरी तस्वीर बनी,
गुस्ताखी क्या थी, कब की मैंने,
इल्म इसका था मुझे नहीं!